गुरुवार, 18 फ़रवरी 2010
गुरुवार, 11 फ़रवरी 2010
"इस देश में क्रांति नहीं हो सकती"
ज़्यादा पुरानी नहीं है , एक फिल्म में ये डायलॉग सुना था । आप देख सकते हैं , यहाँ सब्र वाले समझदार लोग हैं - ठीक राजनीतिज्ञों की तरह । क्योंकि हम में चरित्र नहीं था , इसीलिये हमने नए ज़माने के हिसाब से चलने को सही माना और जिनमें हिम्मत थी उनकी राहों में हमने बम रखे , बंदूक रखी , उन्हें मार डाला क्योंकि अपनी हस्ती बचानी थी । खुद राज करना था । शायद भगवान भी यही चाहता था । तभी तो गांधी को जल्दी उठा लिया , पटेल को उठा लिया , लोहिया और जे पी कुछ नहीं कर सके । इंदिरा गांधी में इच्छाशक्ति थी - मारी गयी । राजीव गांधी को राजनीति नहीं आती थी , मारा गया । और जब तक इस देश के कर्णधारों (मुझे इस शब्द का ठीक-ठीक अर्थ मालूम नहीं है) को होश आता , तब तक एक बाबरी ढह चुकी थी । अब 'डैमेज कंट्रोल' में लगे हैं : "पार्टी की छवि भी सुधर जाएगी" । समझदार लोग जानते हैं , क्रांति का अब कोई मतलब नहीं है .
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