गुरुवार, 18 फ़रवरी 2010
गुरुवार, 11 फ़रवरी 2010
"इस देश में क्रांति नहीं हो सकती"
ज़्यादा पुरानी नहीं है , एक फिल्म में ये डायलॉग सुना था । आप देख सकते हैं , यहाँ सब्र वाले समझदार लोग हैं - ठीक राजनीतिज्ञों की तरह । क्योंकि हम में चरित्र नहीं था , इसीलिये हमने नए ज़माने के हिसाब से चलने को सही माना और जिनमें हिम्मत थी उनकी राहों में हमने बम रखे , बंदूक रखी , उन्हें मार डाला क्योंकि अपनी हस्ती बचानी थी । खुद राज करना था । शायद भगवान भी यही चाहता था । तभी तो गांधी को जल्दी उठा लिया , पटेल को उठा लिया , लोहिया और जे पी कुछ नहीं कर सके । इंदिरा गांधी में इच्छाशक्ति थी - मारी गयी । राजीव गांधी को राजनीति नहीं आती थी , मारा गया । और जब तक इस देश के कर्णधारों (मुझे इस शब्द का ठीक-ठीक अर्थ मालूम नहीं है) को होश आता , तब तक एक बाबरी ढह चुकी थी । अब 'डैमेज कंट्रोल' में लगे हैं : "पार्टी की छवि भी सुधर जाएगी" । समझदार लोग जानते हैं , क्रांति का अब कोई मतलब नहीं है .
बुधवार, 10 फ़रवरी 2010
सोमवार, 23 मार्च 2009
क्या लिखूं ! लिखने के लिए कुछ नहीं है । ये ब्लॉग शुरू किया है तो इसलिए नहीं कि मेरे पास कहने को कुछ है । बल्कि इसलिए किया है कि मेरा दिमाग खराब हो गया है । आज तक इसीलिये चुप रहा कि अगर मैं कुछ अच्छा नहीं कर सकता तो बुरा भी क्यों करूँ , क्यों आग लगाऊँ । जो चलता है अपने आप ठीक हो जायेगा , बिना हल्ले के ; समझदार लोग हैं न , वो ठीक कर रहे हैं । तो क्यों बीच में पंगा डाला जाये ? क्यों उनके काम को बर्बाद किया जाये ? लेकिन मैं भी कब तक चुप रहूँ । समाज को बचाते-बचाते मैं ही ख़त्म हो गया । क्या है , कि समाज हमसे-आपसे तो सुधरने से रहा , हम चाहे कितनी भी कोशिश क्यों न कर लें । तो सुधरना किसको चाहिए ? - हम फालतू लोगों को , जो दुनियावी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़कर देशभक्ति और इंसानियत जैसी बकवास से अपने आपको तसल्ली देते हैं । लेकिन हम भी टेढ़ी खीर हैं । ऐसे में अगर समाज को अपने से बचाना हो , तो खुद को ख़त्म होने से कैसे रोक सकते हैं ? हमें तो अपना होना ही काफी हो सकता है , पर समाज तो ऐसा बेवक़ूफ़ नहीं है न । वो तो आपको ख़त्म कर ही सुरक्षित महसूस कर सकता है ।
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